Sunday, May 31, 2015

हाथो में कुल्हाड़ी को देखा तो बहुत रोया
इक पेड़ जो घबराकर रोया तो बहुत रोया
जब पेड़ नहीं होंगे तो नीड कहाँ होंगे
इक डाल के पंछी ने सोचा तो बहुत रोया
दम घुटता है साँसों का जीयें तो जियें कैसे...
इंसान ने सेहत को खोया तो बहुत रोया
जाने ये मिलाते हैं क्या ज़हर सा मिटटी में
इक खिलता बगीचा जब उजड़ा तो बहुत रोया
हँसता हुआ आया था जो दर्या पहाड़ों से
अज्ञात वो नगरों से गुजरा तो बहुत रोया

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