PARYAVARAN...ENVIRONMENT ..GHAZAL
पर्यावरण दिवस पर एक ग़ज़ल ...
बद हवासी में दरख्तों को गिराने वालो
आबे दरया को यूं ज़हरीला बनाने वालो
तुम पे कुदरत का यकीनन ही कहर टूटेगा
वक़्त रहते जो नहीं चेते ज़माने वालो
सोचिए क्या हश्र होगा उस नई पीढ़ी का
जो कि आएगी तुम्हारे बाद जाने वालो
इस हवस की कोई हद तो हो मुकर्रर आखिर
रोज़ आँखों में नए सपने सजाने वालो
कैसे जन्नत को जहन्नुम सा बना डाला है
सोचो खुद को खुद ही सूली पर चढ़ाने वालो
पर्यावरण दिवस पर एक ग़ज़ल ...
बद हवासी में दरख्तों को गिराने वालो
आबे दरया को यूं ज़हरीला बनाने वालो
तुम पे कुदरत का यकीनन ही कहर टूटेगा
वक़्त रहते जो नहीं चेते ज़माने वालो
सोचिए क्या हश्र होगा उस नई पीढ़ी का
जो कि आएगी तुम्हारे बाद जाने वालो
इस हवस की कोई हद तो हो मुकर्रर आखिर
रोज़ आँखों में नए सपने सजाने वालो
कैसे जन्नत को जहन्नुम सा बना डाला है
सोचो खुद को खुद ही सूली पर चढ़ाने वालो
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