Tuesday, June 14, 2016

अदा बाँकी,नज़र तिरछी,बला की ये नज़ाकत है
ग़ज़ल सा हुस्न ये तेरा,हरिक दिल की ही चाहत है
पशेमानी में डालेगी किसी दिन देखना मुझ को
मेरे दिल की कहीं पर भी मचलने की जो आदत है
हिकारत से न इसको इस कदर देखो जहां वालो
यही काँटा चमन में फूल की करता हिफाजत है
भले ही धर्म कोई हो, सभी इक बात सिखलाते
मदद मज़लूम की करना ही बस सच्ची इबादत है
डराया हर घड़ी अज्ञात को भी वक़्ते आखिर ने
मगर ये ज़िंदगी अब तक दुआओं से सलामत है

ग़ज़ल

अभी तो है आसमान बाकी
अभी है मेरी उड़ान बाक़ी
गवाही झूठों की हो चुकी है
अभी है सच का बयान बाकी
अभी है मेरा ज़मीर ज़िंदा
है पुरखों का इक मकान बाकी
चलूंगा ऐ मौत साथ तेरे
अभी है थोड़ी थकान बाकी