ज़ीस्त के सहरा में कुछ रोज़ तमाशे कर के
चल दिये जिस्म को मिट्टी के हवाले कर के
ज़िंदगी दाव तेरा चल न सकेगा कोई
मौत आएगी किसी रोज़ बहाने कर के
लौट जाता है यूँ ही रोज़ सियासी सूरज
चंद लोगों के दियारों में उजाले कर के
कामयाबी का ज़रा स्वाद जो चक्खा उसने
बढ़ गया आगे वो रिश्तों को किनारे कर के
मेरा माज़ी है या अज्ञात मेरा मुस्तक़बिल
कौन मुझ को ये बुलाता है इशारे कर के
चल दिये जिस्म को मिट्टी के हवाले कर के
ज़िंदगी दाव तेरा चल न सकेगा कोई
मौत आएगी किसी रोज़ बहाने कर के
लौट जाता है यूँ ही रोज़ सियासी सूरज
चंद लोगों के दियारों में उजाले कर के
कामयाबी का ज़रा स्वाद जो चक्खा उसने
बढ़ गया आगे वो रिश्तों को किनारे कर के
मेरा माज़ी है या अज्ञात मेरा मुस्तक़बिल
कौन मुझ को ये बुलाता है इशारे कर के