Thursday, March 31, 2011

ghazal on mother

घर घर चूल्हा चौका करती  करती सूट सिलाई  माँ
बच्चों खातिर जोड़ रही है देखो पाई पाई मां

बाबूजी की आमद भी कम ऊपर से ये महंगाई
टूटे चश्मे से बामुश्किल करती है तुरपाई मां

टीका कुंडल हसली कंगन  तगड़ी नाथ बिछुए चुटकी
बेटी की शादी की  खातिर सब  गिरवी रख आई मां

सहते सहते सारे घर की बढती जिम्मेवारी को
घटते घटते आज बची है केवल एक तिहाई मां

सारे रिश्ते झूठे निकले मतलब के थे यार सभी
केवल तूने ही आजीवन निश्छल प्रीत निभाई मां

पिज्जा बर्गर कब होते थे होते थे मीठे पूड़े
देती थी रोटी पर रख कर शक्कर और मलाई मां

घेरा जब जब अवसादों ने अंधियारों में जीवन को
उम्मीदों के दीप जला कर भोर सुहानी ली मां

दर्ज़न भर लोगों का कुनबा फिर भी था सांझा चूल्हा 
मिलजुल कर रहती थी घर में दादी चाची ताई मां

नाम सभी हैं गुड से मीठे चाहे मैं कुछ भी बोलूं 
बी जी जननी माता मम्मी  मैया अम्मा माई मां

बच्चा ही मकसद होता है मां के जीवन का अज्ञात
हिम्मत दे उस के ख्वाबों को देती है ऊंचाई मां




      

   

ghazal

कहाँ कोई हिन्दू मुसल्मा बुरा है
जो नफ़रत सिखाये वो इंसा बुरा है

सियासत में हरगिज़ न इनको घसीटो
न गीता बुरी है न कुर आ   बुरा है

लहू जो बहाता है निर्दोष जन का
यक़ीनन अधर्मी वो शैता बुरा है

उजाड़े नशेमन परिंदों का नाहक
उखाड़े शज़र जो वो तूफा बुरा है

बिना कुछ किये ही मिले कामयाबी
ये हसरत बुरी है ये अरमा बुरा है

सफ़र जिंदगानी का छोटा है बेशक
जुटाना बहुत सारा सामा बुरा है