Thursday, March 31, 2011

ghazal

कहाँ कोई हिन्दू मुसल्मा बुरा है
जो नफ़रत सिखाये वो इंसा बुरा है

सियासत में हरगिज़ न इनको घसीटो
न गीता बुरी है न कुर आ   बुरा है

लहू जो बहाता है निर्दोष जन का
यक़ीनन अधर्मी वो शैता बुरा है

उजाड़े नशेमन परिंदों का नाहक
उखाड़े शज़र जो वो तूफा बुरा है

बिना कुछ किये ही मिले कामयाबी
ये हसरत बुरी है ये अरमा बुरा है

सफ़र जिंदगानी का छोटा है बेशक
जुटाना बहुत सारा सामा बुरा है



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