Monday, April 28, 2014

ghazals

कौन कहेगा इस को चंगा, रहने दो 
मार पिटाई हरदम पंगा, रहने दो ...
सच्ची झूठी अफवाहें मत फैलाओ
मत भड़काओ देश में दंगा रहने दो....
वोटों के चक्कर में हम को मत बांटो
हर छत पर तुम एक तिरंगा रहने दो....
कूड़ा,कचरा, लाशें मत फेंको इस में 
यारो इस गंगा को गंगा रहने दो...








फकत वोटों की खातिर झूठे वादे करने वालों को
सबक सिखलाएंगे अब के छलावे करने वालों को ...
नहीं गुमराह होंगे हम किसी की बातों में आ कर 
न गद्दी पर बिठाएंगे तमाशे करने वालों को...
गरीबी,भुखमरी,बेरोजगारी से लड़ेंगे वो
चलो हम हौसला देवें इरादे करने वालों को ...
चुनावी वायदे अपने कभी पूरे नहीं करते
बहाना चाहिए कोई बहाने करने वालों को....
सियासी चाल में फंस कर अंधेरों में हैं हम भटके
कि अब के वोट डालेंगे उजाले करने वालों को....





उलफत में सियासत न करे भूल कर कोई 
रिश्तों की तिजारत न करे भूल कर कोई 

तदबीर से तक़दीर बनाने का रखेँ दम 
किस्मत से शिकायत न करे भूल कर कोई 

मैं रंग हूँ ,मकरंद हूँ,खुशबू हूँ फूल की 
छूने की हिमाकत न करे भूल कर कोई 

हर दिल में मुहब्बत का उजाला दिखाई दे 
नफरत या अदावत न करे भूल कर कोई 

हर हाल में सच्चाई का सब साथ दें अजय 
झूठे की हिमायत न करे भूल कर कोई

ghazals

इक ग़म में जब से मुब्तला रहने लगा हूँ मैं 
अपने वुजूद से खफा रहने लगा हूँ मैं...
देखा था बेनकाब किसी रोज़ चाँद को 
खिड़की के सामने खड़ा रहने लगा हूँ मैं ...
कागज़ पे इक रिसाले के छप कर मैं क्या करूँ 
अब तेरे दिल में दिलरुबा रहने लगा हूँ मैं .....
दिल को नहीं सुहाता है शोरे तरब ज़रा 
बज़्मे तरब में सहमा सा रहने लगा हूँ मैं....
पहले सी जिस्म में नहीं ताकत रही अजय 
पहले से ज्यादा चिड़चिड़ा रहने लगा हूँ मैं...








अपना अपनों को छलता है 
अपनों का ही सुख खलता है... 
चेहरा पढ़ कर बतला दूंगा 
तेरे मन में क्या चलता है... 
कच्ची नींद जगा मत देना 
आँखों में सपना पलता है ... 
नेता,व्यापारी,अधिकारी 
काला धन सब को फलता है ... 
मगरिब में क्यूँ रोज़ाना ही 
साँझ ढले सूरज ढलता है... 
ग़ज़लों में नुक्ते मत देखो 
चलने दो सब कुछ चलता है...