Monday, April 28, 2014

ghazals

इक ग़म में जब से मुब्तला रहने लगा हूँ मैं 
अपने वुजूद से खफा रहने लगा हूँ मैं...
देखा था बेनकाब किसी रोज़ चाँद को 
खिड़की के सामने खड़ा रहने लगा हूँ मैं ...
कागज़ पे इक रिसाले के छप कर मैं क्या करूँ 
अब तेरे दिल में दिलरुबा रहने लगा हूँ मैं .....
दिल को नहीं सुहाता है शोरे तरब ज़रा 
बज़्मे तरब में सहमा सा रहने लगा हूँ मैं....
पहले सी जिस्म में नहीं ताकत रही अजय 
पहले से ज्यादा चिड़चिड़ा रहने लगा हूँ मैं...








अपना अपनों को छलता है 
अपनों का ही सुख खलता है... 
चेहरा पढ़ कर बतला दूंगा 
तेरे मन में क्या चलता है... 
कच्ची नींद जगा मत देना 
आँखों में सपना पलता है ... 
नेता,व्यापारी,अधिकारी 
काला धन सब को फलता है ... 
मगरिब में क्यूँ रोज़ाना ही 
साँझ ढले सूरज ढलता है... 
ग़ज़लों में नुक्ते मत देखो 
चलने दो सब कुछ चलता है...

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