आँखों से एक अश्क, बहाने नहीं दिया
ग़म का ज़रा-भी बोझ, उठाने नहीं दिया
टीका लगा के माँ ने मेरे कान के क़रीब
मुझ तक बला के साये को आने नहीं दिया
बुझने नहीं दिया कभी उम्मीद का चिराग़
मन में कभी निराशा को छाने नहीं दिया
अच्छे बुरे की सीख हमेशा ही मां ने दी
टहनी से इक परिंदा उड़ाने नहीं दिया
हमने अना के सख़्त यूँ पहरे बिठा दिए
ख़ुद ही से ख़ुद को मिलने-मिलाने नहीं दिया
पहले सा जज़्बा आज भी कायम है दोस्तो
आड़े कभी भी उम्र को आने नहीं दिया
'अज्ञात' तुझ को पाप लगेगा ये जान ले
पंछी को घोंसला जो बनाने नहीं दिया