Thursday, December 8, 2022

काजल लगा के मां ने मेरे कान के करीब

 आँखों से एक अश्क, बहाने नहीं दिया

ग़म का ज़रा-भी बोझ, उठाने नहीं दिया 


टीका लगा के माँ ने मेरे कान के क़रीब

मुझ तक बला के साये को आने नहीं दिया 


बुझने नहीं दिया कभी उम्मीद का चिराग़

मन में कभी निराशा को छाने नहीं दिया


अच्छे बुरे की सीख हमेशा ही मां ने दी

टहनी से इक परिंदा उड़ाने नहीं दिया


हमने अना के सख़्त यूँ पहरे बिठा दिए

ख़ुद ही से ख़ुद को मिलने-मिलाने नहीं दिया


पहले सा जज़्बा आज भी कायम है दोस्तो

आड़े कभी भी उम्र को आने नहीं दिया


'अज्ञात' तुझ को पाप लगेगा ये जान ले

पंछी को घोंसला जो बनाने नहीं दिया

आईना हो जाऊंगा

 रौशनी दर रौशनी का सिलसिला हो जाऊँगा

इल्म की भट्टी में तप कर मैं ख़रा हो जाऊँगा


काँच का टुकड़ा हूँ जब तक, चुभ रहा हूँ सब को मैं

सब मुझे देखेंगे, जब मैं आईना हो जाऊँगा


एक टुकड़ा धूप से, साये को कर ईज़ाद मैं

अपनी ही परछाईं में जा कर खड़ा हो जाऊँगा


ख़ुदनुमायी, ख़ुदसताइश का नहीं तालिब हूँ मैं

अपने कहने से भला क्या मैं बड़ा हो जाऊँगा


और कुछ दिन बातों का ये सिलसिला चलता रहे

और कुछ दिन बाद शायद मैं तेरा हो जाऊँगा


हो चला है अब पुराना रूह का ये पैरहन

एक दिन इसको बदल कर मैं नया हो जाऊँगा


ज़िंदगी के मसअले हो जायेंगे हल ख़ुद ब ख़ुद

मैं अना की क़ैद से जिस दिन रिहा हो जाऊंगा