Thursday, December 8, 2022

आईना हो जाऊंगा

 रौशनी दर रौशनी का सिलसिला हो जाऊँगा

इल्म की भट्टी में तप कर मैं ख़रा हो जाऊँगा


काँच का टुकड़ा हूँ जब तक, चुभ रहा हूँ सब को मैं

सब मुझे देखेंगे, जब मैं आईना हो जाऊँगा


एक टुकड़ा धूप से, साये को कर ईज़ाद मैं

अपनी ही परछाईं में जा कर खड़ा हो जाऊँगा


ख़ुदनुमायी, ख़ुदसताइश का नहीं तालिब हूँ मैं

अपने कहने से भला क्या मैं बड़ा हो जाऊँगा


और कुछ दिन बातों का ये सिलसिला चलता रहे

और कुछ दिन बाद शायद मैं तेरा हो जाऊँगा


हो चला है अब पुराना रूह का ये पैरहन

एक दिन इसको बदल कर मैं नया हो जाऊँगा


ज़िंदगी के मसअले हो जायेंगे हल ख़ुद ब ख़ुद

मैं अना की क़ैद से जिस दिन रिहा हो जाऊंगा

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