ज़रा सी दाद देने में भी उन पर ज़ोर पड़ता है
यहाँ इक शेर कहने में पसीने छूट जाते हैं
आँखों से एक अश्क, बहाने नहीं दिया
ग़म का ज़रा-भी बोझ, उठाने नहीं दिया
टीका लगा के माँ ने मेरे कान के क़रीब
मुझ तक बला के साये को आने नहीं दिया
बुझने नहीं दिया कभी उम्मीद का चिराग़
मन में कभी निराशा को छाने नहीं दिया
अच्छे बुरे की सीख हमेशा ही मां ने दी
टहनी से इक परिंदा उड़ाने नहीं दिया
हमने अना के सख़्त यूँ पहरे बिठा दिए
ख़ुद ही से ख़ुद को मिलने-मिलाने नहीं दिया
पहले सा जज़्बा आज भी कायम है दोस्तो
आड़े कभी भी उम्र को आने नहीं दिया
'अज्ञात' तुझ को पाप लगेगा ये जान ले
पंछी को घोंसला जो बनाने नहीं दिया
रौशनी दर रौशनी का सिलसिला हो जाऊँगा
इल्म की भट्टी में तप कर मैं ख़रा हो जाऊँगा
काँच का टुकड़ा हूँ जब तक, चुभ रहा हूँ सब को मैं
सब मुझे देखेंगे, जब मैं आईना हो जाऊँगा
एक टुकड़ा धूप से, साये को कर ईज़ाद मैं
अपनी ही परछाईं में जा कर खड़ा हो जाऊँगा
ख़ुदनुमायी, ख़ुदसताइश का नहीं तालिब हूँ मैं
अपने कहने से भला क्या मैं बड़ा हो जाऊँगा
और कुछ दिन बातों का ये सिलसिला चलता रहे
और कुछ दिन बाद शायद मैं तेरा हो जाऊँगा
हो चला है अब पुराना रूह का ये पैरहन
एक दिन इसको बदल कर मैं नया हो जाऊँगा
ज़िंदगी के मसअले हो जायेंगे हल ख़ुद ब ख़ुद
मैं अना की क़ैद से जिस दिन रिहा हो जाऊंगा
वतन की आन है हिन्दी , वतन की शान है हिन्दी
वतन की आत्मा हिन्दी, वतन की जान है हिन्दी ॥
सरल है व्याकरण इसका ,सरल है लिखने पढ़ने में
करें हम काम हिन्दी में,बहुत आसान है हिन्दी ॥
विलक्षण सभ्यता साहित्य का दर्शन कराती है
ज़मानेभर में भारत देश की,पहचान है हिन्दी ॥
जगा कर चेतना उर में,कुशल व्यवहार सिखलाती
कलमकारों की श्रद्धा है, धरम ईमान है हिन्दी॥
कहीं तुलसी की चौपाई , कहीं मीरा के भजनों में
कहीं कान्हा के मुरली की, सुरीली तान है हिंदी॥
मिलना जुलना जब से है दूभर हुआ
कारोबारे इश्क़ गुड़ गोबर हुआ
कितने साये घेरे रहते हैं मुझे
रौशनी का जब से मैं पैकर हुआ
दुनियादारी में था कुछ कमज़ोर मैं
अपनी तन्हाई का ख़ुद महवर हुआ
कोट-टाई, कुर्ता-धोती, टोपियां
तो कहीं पहचान इक मफ़लर हुआ
कैसी कैसी आ गईं बीमारियां
ऐसे में जीना बहुत दुष्कर हुआ
वक़्त ने बदले हैं तेवर देखिए
क़तरा-ए-शबनम भी है अख़गर हुआ
दिल का मौसम कुछ अजब सा है 'अजय'
खेत अहसासात का बंजर हुआ
किसने कहा है तुम से मैं शाइर हूँ बेमिसाल
फ़नकार हूँ कि कोई मुसव्विर हूँ बेमिसाल
अफ़सुर्दगी बिछी है जहाँ दूर दूर तक
उस राहे इश्क़ का मैं मुसाफ़िर हूँ बेमिसाल
परवाज़ ऊंची मेरे तख़य्युल की देख कर
कहने लगे हैं लोग मैं ताइर हूँ बेमिसाल
सौदे में इश्क़ के न मुनाफ़ा हुआ कभी
कैसे भला ये कह दूं मैं ताजिर हूँ बेमिसाल
मुझ को भी तो पता चले आख़िर वो कौन है
किसने कहा है तुम से मैं शाइर हूँ बेमिसाल
मुसव्विर। चित्रकार
अफ़सुर्दगी। बेचैनी, परेशानी
तख़य्युल कल्पना
ताइर पंछी
ताजिर व्यापारी
लफ़्ज़ की बेचारगी को कौन समझे
गुफ़्तगू में ख़ामुशी को कौन समझे
जो भी हो बेइंतिहा प्यारी है मुझको
ज़ीस्त की पेचीदगी को कौन समझे
हर किसी के पास अपना सायबां है
धूप तेरी तिश्नगी को कौन समझे
बस समुंदर ही समझ सकता है इसको
उस से बेहतर इस नदी को कौन समझे
है ज़रूरी हम लुग़त भी साथ रक्खें
इतनी मुश्किल शाइरी को कौन समझे
ख़ुदशनासी की कोई सूरत नहीं है
आइने की बेबसी को कौन समझे
जितने मुँह उतनी ही बातें हो रही हैं
अब हमारी दोस्ती को कौन समझे
जैसे चाहे क़ाफ़िये कहिये ग़ज़ल में
बेसबब हर्फ़े रवी को कौन समझे