Friday, July 9, 2021

कौन समझे

 लफ़्ज़ की बेचारगी को कौन समझे

गुफ़्तगू में ख़ामुशी को कौन समझे


जो भी हो बेइंतिहा प्यारी है मुझको

ज़ीस्त की पेचीदगी को कौन समझे


हर किसी के पास अपना सायबां है

धूप तेरी तिश्नगी को कौन समझे


बस समुंदर ही समझ सकता है इसको

उस से बेहतर इस नदी को कौन समझे


है ज़रूरी हम लुग़त भी साथ रक्खें

इतनी मुश्किल शाइरी को कौन समझे


ख़ुदशनासी की कोई सूरत नहीं है

आइने की बेबसी को कौन समझे


जितने मुँह उतनी ही बातें हो रही हैं

अब हमारी दोस्ती को कौन समझे


जैसे चाहे क़ाफ़िये कहिये ग़ज़ल में

बेसबब हर्फ़े रवी को कौन समझे


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