आइना दर आइना ये सिलसिला देखा गया
शीशागर ही पत्थरों को पूजता देखा गया
चाह कर भी ख़ुद मैं अपने साथ चल पाया नहीं
ज़ेह्न ओ दिल के बीच अक़्सर फ़ासला देखा गया
इक अजब सा था नज़ारा बज़्म में कल हर कोई
अपने जैसा एक साथी ढूँढ़ता देखा गया
सुर्ख़ियों में है छपा ये आज के अख़बार में
हक़ की ख़ातिर एक गूँगा चीख़ता देखा गया
इश्क़ को रुस्वा न कर दे ये छलक कर इसलिए
आँख की दहलीज़ पर आँसू रुका देखा गया
ऐप पर कर के भरोसा, मंज़िलों की चाह में
दर ब दर फिर इक भटकता क़ाफ़िला देखा गया
फिर से इसके फूलने फलने की उम्मीदें जगीं
इश्क़ के पौधे पे इक पत्ता हरा देखा गया
बज़्म में जो भी थे सब ने दाद खुल कर दी मुझे
शाइरी में फ़िक़्र का जब ज़ाविया देखा गया
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