Friday, July 9, 2021

आईना हो जाऊंगा

 तीरगी में रौशनी का सिलसिला हो जाऊँगा

इल्म की भट्टी में तप कर मैं ख़रा हो जाऊँगा


काँच का टुकड़ा हूँ जब तक, चुभ रहा हूँ सब को मैं

सब मुझे देखेंगे, जब मैं आईना हो जाऊँगा


एक टुकड़ा धूप से ईज़ाद कर साये को मैं

अपनी ही परछाईं में जा कर खड़ा हो जाऊँगा


ख़ुदनुमायी, ख़ुदसताइश का नहीं तालिब हूँ मैं

अपने कहने से भला क्या मैं बड़ा हो जाऊँगा


हो चला है अब पुराना रूह का ये पैरहन

एक दिन इसको बदल कर मैं नया हो जाऊँगा

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