Friday, July 9, 2021

ग़ज़ल

 कहाँ हूँ मैं, नहीं मुझ को पता है

जुनूने शाइरी सर पर चढ़ा है


जो मुद्दत से मेरे दिल में बसा है

वो मुझ को मुझ से बेहतर जानता है


वहीं सब अजनबी मुझ को हैं कहते

जहाँ हर कोई मुझ से आशना है


बहुत ही कश्मकश है ज़िंदगी में

मेरा ज़ख़्मे जिगर अब भी हरा है


मुझे मंज़ूर है किरदार मेरा

ये जैसा भी है, अच्छा या बुरा है

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