नहीं सुहाती ज़रा भी फटी हुई ढोलक
मैं और कितनी बजाऊँ ये बेसुरी ढोलक
मैं जितना ज़ोर से पीटूँ इसे तो उतनी ही
हँसे है ज़ोर - ज़ोर से ये मसखरी ढोलक
ग़ज़ल सुनाऊँगा तुझ को ये मेरा वादा है
तू तानपूरा बजा या कि फिर कोई ढोलक
वो अपने बाप से मासूमियत से जा लिपटी
फिर उसके पेट को छू कर के कह उठी 'ढोलक'
वो मेमना जो खड़ा है वहाँ रुआँसा सा
ये उस की माँ की ही चमड़ी से है बनी ढोलक
ज़रा क़रीब जो आ कर है तबला बैठ गया
बस इतनी बात पे बिगड़ी है चिड़चिड़ी ढोलक
इसे पसंद है हाथों की चूड़ियों की खनक
ज़रा सा छूते ही उनके मचल उठी ढोलक
कहीं है सुर तो कहीं ताल, माज़रा क्या है
हुआ है क्या जो ये सुर से भटक गयी ढोलक
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