Friday, July 9, 2021

ग़ज़ल ख़ामख्वा

 बेतरह पत्थर उछाले ख़ामख़्वा

आइने सब तोड़ डाले ख़ामख़्वा


कुछ नहीं इनमें सराबों के सिवा

लोग टकराते पियाले ख़ामख़्वा


एक भी मोती हमें न मिल सका

कितने ही सागर खंगाले ख़ामख़्वा


अपने दिल को अपने क़ाबू में रखो

मत करो मेरे हवाले ख़ामख़्वा


फ़ेसबुक ट्विटर पे रहते वयस्त हैं

हमने कैसे रोग पाले ख़ामख़्वा


तीरगी शब में मुसल्लत है मगर

हो रहे दिन में उजाले ख़ामख़्वा


अपना चेहरा तो नहीं देखा कभी

नुक़्स दर्पण में निकाले ख़ामख़्वा


लौट कर वापिस वहीं पर आ गए

पड़ गए पैरों में छाले ख़ामख़्वा

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