Friday, July 9, 2021

ग़ज़ल

 हम उनकी मुहब्बत के तलबगार नहीं हैं

दुनिया में जो भी लोग वफ़ादार नहीं हैं


रखते हैं तवक़्क़ो वे यहाँ सब से मदद की

जो लोग किसी के भी मददगार नहीं हैं


हम ने सभी के वास्ते माँगी हैं दुआएँ

हम तो किसी की राह की दीवार नहीं हैं


चीज़ें हैं सभी काम की जो भी हैं जहां में

बेकार जिन्हें कहते हैं बेकार नहीं हैं


बीमार हैं जो इश्क़ के ज़िंदा हैं वही लोग

मुर्दा हैं वे जो इश्क़ के बीमार नहीं हैं


वो काम जिन्हें करने से घबरा रहे हो तुम

मुश्किल हैं मगर इतने भी दुश्वार नहीं हैं


इस ज़ीस्त को हम अपनी ही शर्तों पे जियेंगे

दुनिया! तेरी शर्तें हमें स्वीकार नहीं हैं


हम रात को दिन, दिन को कभी रात न कहते

हस्सास हैं, झूठे के तरफ़दार नहीं हैं


बुनियाद ही जिसकी हो टिकी झूठ पे 'अज्ञात'

उस रिश्ते के बचने के तो आसार नहीं हैं

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