ख़ुद को ज़रा सा वक़्त के साँचे में ढाल कर
रख दे वजूद से ज़रा 'मैं' को निकाल कर
फ़िक्रे सुख़न में खून को रख दे जला के तू
दुनिया तेरी मिसाल दे ऐसा कमाल कर
दे दे निजात प्यास से सहरा को एक दिन
हैरत में डाल दे कोई चश्मा निकाल कर
इस ज़िंदगी से जिस को मुहब्बत नहीं मिली
रखता है अपने सीने में गुस्सा उबाल कर
मेहनत से अपने लक्ष्य को पाने का कर जतन
किस्मत ने क्या दिया है न उसका मलाल कर
इक्कीसवीं सदी के मेरे नोजवान सुन
तहजीब के शजर को तू रखना सँभाल कर
आकाश में न छेद कभी कर सकेगा तू
जितना भी चाहे देख ले पत्थर उछाल कर
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