ज़र्रे से आफ़ताब हुए रब की मेहर से
जीवन में कामयाब हुए रब की मेहर से
हम दश्ते आरज़ू में थे जिन से घिरे हुए
सब दूर वो अज़ाब हुए रब की मेहर से
बेमंज़री थी पहले जहाँ अब उसी जगह
हमराह हैं गुलाब हुए रब की मेहर से
मेहनत के साथ थोड़ी सी किस्मत भी साथ थी
हासिल कई ख़िताब हुए रब की मेहर से
मेरी कहाँ बिसात की मैं शेर कह सकूं
अशआर लाजवाब हुए रब की मेहर से
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