Tuesday, April 23, 2013

ghazal

ये लगता हिजड़ों की है यहाँ सरकार दिल्ली में
कि नंगा नाच करती है हवस दिलदार दिल्ली में ...
तबाही का सबब है हर तरफ़ दहशत का मंज़र है
सुरक्षित है नहीं अब आप का घरबार दिल्ली में
बिखरने से बचा ले जो हमारे देश की इज्ज़त
नहीं ढूँढे से मिलता साहिबे किरदार दिल्ली में
रुदन है हर तरफ ही सब के चेहरे ग़म में डूबे हैं
कि जीना बेटियों का हो गया दुश्वार दिल्ली में
दिलों को रख दिया झिंजोड़ कर कुछ हादसों ने यूं
मची है हर तरफ अज्ञात हाहाकार दिल्ली में

dilli mein...ghazal

ये लगता हिजड़ों की है यहाँ सरकार दिल्ली में
कि नंगा नाच करती है हवस दिलदार दिल्ली में ...
तबाही का सबब है हर तरफ़ दहशत का मंज़र है
सुरक्षित है नहीं अब आप का घरबार दिल्ली में
बिखरने से बचा ले जो हमारे देश की इज्ज़त
नहीं ढूँढे से मिलता साहिबे किरदार दिल्ली में
रुदन है हर तरफ ही सब के चेहरे ग़म में डूबे हैं
कि जीना बेटियों का हो गया दुश्वार दिल्ली में
दिलों को रख दिया झिंजोड़ कर कुछ हादसों ने यूं
मची है हर तरफ अज्ञात हाहाकार दिल्ली में

ghazal

किसी कोने में सिमटा सा पड़ा हूँ
मैं अपने घर में ही खुद लापता हूँ
मुझे इल्ज़ाम देता है ज़माना
कि मैं खामोश रह कर चीखता हूँ
वफा के गीत का उनवान हूँ मैं
मुहब्बत की ग़ज़ल का काफिया हूँ
भुलाना है नहीं आसान मुझ को
तुम्हारे साथ गुजरा वाकिया हूँ
ज़रूरत और अना में छिड़ गयी है
नदी के सामने प्यासा खड़ा हूँ

Thursday, April 4, 2013

ग़ज़ल

कल्पना ज़रूरी है भावना ज़रूरी है
शायरी में शायर की आत्मा ज़रूरी है... 
मुश्किलें तो आयेंगी इम्तिहान लेने को
कामयाबी की खातिर हौसला ज़रूरी है... 
जीने का सलीका गर सीखना सिखाना हो 
पास में बुजुर्गों के बैठना ज़रूरी है.... 
कौम से जहालत की तीरगी मिटने को
इक दिया जलाना भी इल्म का ज़रूरी है... 
छोड़ दो झगड़ना अब बेफिजूल बातों पर
वक़्त का तकाज़ा है एकता ज़रूरी है... 
मुस्तफा ने बक्शा है नूर सा जो ग़ज़लों में 
फैज़ का अदा करना शुक्रिया ज़रूरी है....

ग़ज़ल

देखो मुखौटे को ही सब चेहरा समझते हैं 
झूठे को ही सब लोग अब सच्चा समझते हैं ...
दूजे को अपने आप से अच्छा समझते हैं 
हम तो पराए ग़म को भी अपना समझते हैं ....
हम पार कर के आए हैं इक आग का दर्या 
दर्दे जिगर का गीत से रिश्ता समझते हैं
हैरान हैं हम सोच कर आखिर वजह है क्या 
सब प्यार को क्यूँ आग का दर्या समझते हैं ...
दौलत का ऐसा हो गया उनको नशा कि वो 
अच्छे भले इंसान को पगला समझते हैं ...
अज्ञात को तो आज तक समझा नहीं कोई 
दिखता है जो जैसा उसे वैसा समझते हैं ....