Thursday, April 4, 2013

ग़ज़ल

कल्पना ज़रूरी है भावना ज़रूरी है
शायरी में शायर की आत्मा ज़रूरी है... 
मुश्किलें तो आयेंगी इम्तिहान लेने को
कामयाबी की खातिर हौसला ज़रूरी है... 
जीने का सलीका गर सीखना सिखाना हो 
पास में बुजुर्गों के बैठना ज़रूरी है.... 
कौम से जहालत की तीरगी मिटने को
इक दिया जलाना भी इल्म का ज़रूरी है... 
छोड़ दो झगड़ना अब बेफिजूल बातों पर
वक़्त का तकाज़ा है एकता ज़रूरी है... 
मुस्तफा ने बक्शा है नूर सा जो ग़ज़लों में 
फैज़ का अदा करना शुक्रिया ज़रूरी है....

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