किसी कोने में सिमटा सा पड़ा हूँ
मैं अपने घर में ही खुद लापता हूँ
मुझे इल्ज़ाम देता है ज़माना
कि मैं खामोश रह कर चीखता हूँ
वफा के गीत का उनवान हूँ मैं
मुहब्बत की ग़ज़ल का काफिया हूँ
भुलाना है नहीं आसान मुझ को
तुम्हारे साथ गुजरा वाकिया हूँ
ज़रूरत और अना में छिड़ गयी है
नदी के सामने प्यासा खड़ा हूँ
मैं अपने घर में ही खुद लापता हूँ
मुझे इल्ज़ाम देता है ज़माना
कि मैं खामोश रह कर चीखता हूँ
वफा के गीत का उनवान हूँ मैं
मुहब्बत की ग़ज़ल का काफिया हूँ
भुलाना है नहीं आसान मुझ को
तुम्हारे साथ गुजरा वाकिया हूँ
ज़रूरत और अना में छिड़ गयी है
नदी के सामने प्यासा खड़ा हूँ
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