Sunday, October 14, 2012

khushnuma...


खुशनुमा उस दिन से अपनी ज़िंदगानी हो गयी 
आप की जिस दिन से हम पर मेहरबानी हो गयी

आप से मिलने के जब से सिलसिले चलने लगे
तब से ही तक़दीर को भी बदगुमानी हो गयी 

रूम से अपने हटा कर बेटा ये कहने लगा 
दादा दादी की ये फोटो अब पुरानी हो गयी 

छा रही है दोस्तो मुझ पर अज़ब दीवानगी 
मेरे दिल पे जाने किस की हुक्मरानी हो गयी 

आंखो ही आंखो में कह दी और सुन ली बात सब 
गुफ्तगू दोनों में ही यूं बेजुबानी हो गयी 

गड गयी हैं उस तरफ आँखें अमीरे शहर की 
मुफ़लिसी के घर में इक बिटिया सयानी हो गयी
 
मेरी ग़ज़लें पढ़ के अक्सर कहते हैं नक्काद सब 
मेरी ग़ज़लें जैसे घर घर की कहानी हो गयी 

ho koi bhi janwar..

हो कोई भी जानवर या आदमी 
है ज़रूरत हर किसी को प्यार की
दोष होता होंठ का या श्वास का 
बांसुरी होती नहीं है बेसुरी
वक़्त बदला दोस्त भी बदले मेरे 
मायने अब खो रही है दोस्ती
कौन करता है इबादत दिल से अब 
हो गया अब तो खुदा हर आदमी
प्यार में तोहफे मिलें या न मिलें 
प्रेम से मिलना मगर है लाज़मी
द्वार पर तुम आ के दो दस्तक कभी
मैं उतारूँगा तुम्हारी आरती
इक तुम्हारा साथ भाता है मुझे
और दूजे भाती है ये शायरी

gham ner mujh se dosti...

ग़म ने मुझ से दोस्ती यूं खास की 
एक पल में ही खुशी खल्लास की 
शेर में ढल जाएंगे अल्फ़ाज़ फिर 
कोपलें फूटेंगी जब एहसास की
दिल का मौसम कब भला बदलेगा ये 
है तमन्ना मुझ को भी मधुमास की
दिल से दिल के रिश्ते जुडने के लिए 
है ज़रूरत आपसी विश्वास की
हम तो ठहरे एक सूखे कैक्टस 
क्या पता परिभाषा हम को प्यास की

ghazal

anhoni honi ho jaye aisa bhi ho sakta hai
doulat tere kaam n aaye aisa bhi ho sakta hai
yun to kashti dooba karti hai aksar toofano mein 
toofaa.n kashti paar lagaye aisa bhi ho sakta hai
jis ko dar dar dhundha karte mandir masjid gurudware
khaana e dil mein mil jaaye aisa bhi ho sakta hai 
ho sakta hai meri ghazlei.n tujh ko deewana kar dein
tera dil mujh par aa jaye aisa bhi ho sakta hai

tatrane...

तराने मुहब्बत के गाने लगे हैं 
सुनो हाले दिल हम सुनाने लगे हैं 
कभी दिल के रिश्ते बिखरने न पाएँ 
बनाने में इन को जमाने लगे हैं
हो तुम चाँद सूरज तो हम भी हैं जुगनू 
अँधेरों में हम जगमगाने लगे हैं
हमें दुश्मनों की ज़रूरत नहीं है 
हमें अपने साये डराने लगे हैं 
सिखाया था जिन को कभी हम ने चलना 
वही हम को रस्ता दिखाने लगे हैं

ghazal by ajay agyat

जिंदगी से क्या मिला कुछ भी नहीं
किसने हम को क्या दिया कुछ भी नहीं
सिर पे मत लादे फिरो अपनी अना 
इस से बढ़ कर मशविरा कुछ भी नहीं
शेर कहने का है बस हम को नशा 
और अपना मशगला कुछ भी नहीं
जो न हो चर्चा तेरी रानाई का 
फिर ग़ज़ल का मर्तबा कुछ भी नहीं
इश्क़ तो अज्ञात ऐसा रोग है
दुनया में जिसकी दवा कुछ भी नही