Sunday, October 14, 2012

khushnuma...


खुशनुमा उस दिन से अपनी ज़िंदगानी हो गयी 
आप की जिस दिन से हम पर मेहरबानी हो गयी

आप से मिलने के जब से सिलसिले चलने लगे
तब से ही तक़दीर को भी बदगुमानी हो गयी 

रूम से अपने हटा कर बेटा ये कहने लगा 
दादा दादी की ये फोटो अब पुरानी हो गयी 

छा रही है दोस्तो मुझ पर अज़ब दीवानगी 
मेरे दिल पे जाने किस की हुक्मरानी हो गयी 

आंखो ही आंखो में कह दी और सुन ली बात सब 
गुफ्तगू दोनों में ही यूं बेजुबानी हो गयी 

गड गयी हैं उस तरफ आँखें अमीरे शहर की 
मुफ़लिसी के घर में इक बिटिया सयानी हो गयी
 
मेरी ग़ज़लें पढ़ के अक्सर कहते हैं नक्काद सब 
मेरी ग़ज़लें जैसे घर घर की कहानी हो गयी 

No comments:

Post a Comment