Thursday, April 11, 2019

हाँ बहुत ही ख़ुशनुमा है ज़िन्दगी अभी
इश्क़ के चराग़ से है रौशनी अभी
ज़ेहन में है बरक़रार ताज़गी अभी
लुत्फ़ दे रही है मुझ को शाइरी अभी
इक के बाद इक नदी को पी रहा हूँ मैं
मिट न पाई दोस्तो ये तिश्नगी अभी
फेसबुक पे आप का कमेंट देख कर
थम गई थी नब्ज़ जो वो चल पड़ी अभी

ग़ज़ल

देखिए तो कितना तन्हा है अजय
अपने ही साये में बैठा है अजय
तू यक़ीनन ही नसीबों वाला है
चहचहाती घर में चिड़िया है अजय
मुस्कुराता जा रहा है ग़म में जो
हू ब हू ये तुझ सा चेहरा है अजय
देखता है राह कोई आज तक
अधखुला सा इक दरीचा है अजय
घिस गया जब जिस्म तो आया समझ
दुनिया तो केवल छलावा है अजय
लोग जिस को कहते हुस्ने शाइरी
बात कहने का सलीक़ा है अजय

तेरी आँखों ,

तेरी आँखों ने कहा, ये जाने क्या?
मेरी आँखों ने सुना, ये जाने क्या?
देख कर हम को यूँ हँसते खेलते
इस ज़माने को हुआ,ये जाने क्या?
एकटक आंखों  में आंखें डालकर
बोलता है आइना, ये जाने क्या?
जायका इसका ज़रा नमकीन है
अश्क़ में है बह रहा, ये जाने क्या?
दूर ही से देख कर, भयभीत हूँ
मेरी ज़ानिब आ रहा, ये जाने क्या?
मौत से पंजा लड़ाने की है ज़िद
ज़ाविया है जीने का, ये जाने क्या?
रात दिन बेचैन रहता है ये दिल
रोग मुझ को लग गया, ये जाने क्या?

ग़ज़ल

मुझ पे अहसान इतना किया कीजिए
मुस्कुरा कर कभी तो मिला कीजिए
अपनी हद में ये रहने का आदी नहीं
मनचला है ये दिल इसका क्या कीजिए
मुझ को फिर देना है इश्क़ का इम्तेहां
मेरे हक़ में ऐ लोगो दुआ कीजिये
जिस्म ही पर निगाहें हैं अटकी हुईं
हुस्ने किरदार को भी पढ़ा कीजिए
हर कोई तो भरोसे के क़ाबिल नहीं
इतनी जल्दी न सब से खुला कीजिए
आपको एक ही मश्विरा है मेरा
हर किसी से नहीं मश्विरा कीजिए
क़ैद में इसकी हूँ एक मुद्दत से मैं
मुझ को इस जिस्म से अब जुदा कीजिये
आह भरते रहे, कसमसाते रहे
लुत्फ़ यूँ ज़िंदगी का उठाते रहे
ख़ूब तपते रहे वक़्त की आँच में
ख़ुद को सोने से कुंदन बनाते रहे
दिल था शीशे सा नाज़ुक इसी वास्ते
पत्थरों के निशाने पे आते रहे
दिल में कोई किसी के ना घर सका
हम उन्हें, वो हमें आज़माते रहे
अपने बच्चों की ख़ुशियों की ख़ातिर सदा
दाव पर अपनी ख़ुशियाँ लगाते रहे
अपनी ख़ातिर न जीने की फ़ुर्सत मिली
दुनिया दारी में ख़ुद को खपाते रहे
खुल के जीना है अब हम को अपने लिए
ज़िंदगी भर हमें सब नचाते रहे

गुंचे सा जब भी रह गया,,,

गुंचे सा जब भी रह गया ख़ुद में बिखर के मैं
इक अश्क बन के आंख से आया उतर के मैं
ज़र्फ़ ओ शऊर आज भी हमराह हैं मेरे
पहुँचा हूँ इस मक़ाम पे ख़ुद से गुज़र के मैं
जाते हैं इस जहान को सब छोड़ के कहाँ
देखूँगा जीते जी कभी इक बार मर के मैं
हैरत से आइना मुझे ही घूरता मिले
देखूँ कभी जो अक्स को थोड़ा सँवर के मैं
तपता रहा हूँ इल्म की भट्टी में रात दिन
तब जा के आ सका कहीं थोड़ा निखर के मैं

ग़ज़ल

इल्म के चराग़ों बिन रोशनी नहीं होती
दर्द के बिना यारो, शाइरी नहीं होती
ऊँगलियों या होठों का दोष कुछ रहा होगा
बांसुरी कभी यारो बेसुरी नहीं होती
राम जैसा बनने की कोशिशें करो यारो
राम नाम जपने से, बंदगी नहीं होती
दूसरों की ख़ुशियों से जाने क्यों वो कुढ़ते हैं
हमसे तो यूँ ही बेज़ा  ख़ुदकुशी नहीं होती
काश चाहने वाला इक हमें मिला होता
ज़िंदगी से फिर ऐसी बेरुखी नहीं होती
लोग यूँ ही भरती के काफ़िये मिलाते हैं
हमसे तो ग़ज़ल से यूँ दिल्लगी नहीं होती