Thursday, April 11, 2019

ग़ज़ल

देखिए तो कितना तन्हा है अजय
अपने ही साये में बैठा है अजय
तू यक़ीनन ही नसीबों वाला है
चहचहाती घर में चिड़िया है अजय
मुस्कुराता जा रहा है ग़म में जो
हू ब हू ये तुझ सा चेहरा है अजय
देखता है राह कोई आज तक
अधखुला सा इक दरीचा है अजय
घिस गया जब जिस्म तो आया समझ
दुनिया तो केवल छलावा है अजय
लोग जिस को कहते हुस्ने शाइरी
बात कहने का सलीक़ा है अजय

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