आह भरते रहे, कसमसाते रहे
लुत्फ़ यूँ ज़िंदगी का उठाते रहे
ख़ूब तपते रहे वक़्त की आँच में
ख़ुद को सोने से कुंदन बनाते रहे
दिल था शीशे सा नाज़ुक इसी वास्ते
पत्थरों के निशाने पे आते रहे
दिल में कोई किसी के ना घर सका
हम उन्हें, वो हमें आज़माते रहे
अपने बच्चों की ख़ुशियों की ख़ातिर सदा
दाव पर अपनी ख़ुशियाँ लगाते रहे
अपनी ख़ातिर न जीने की फ़ुर्सत मिली
दुनिया दारी में ख़ुद को खपाते रहे
खुल के जीना है अब हम को अपने लिए
ज़िंदगी भर हमें सब नचाते रहे
लुत्फ़ यूँ ज़िंदगी का उठाते रहे
ख़ूब तपते रहे वक़्त की आँच में
ख़ुद को सोने से कुंदन बनाते रहे
दिल था शीशे सा नाज़ुक इसी वास्ते
पत्थरों के निशाने पे आते रहे
दिल में कोई किसी के ना घर सका
हम उन्हें, वो हमें आज़माते रहे
अपने बच्चों की ख़ुशियों की ख़ातिर सदा
दाव पर अपनी ख़ुशियाँ लगाते रहे
अपनी ख़ातिर न जीने की फ़ुर्सत मिली
दुनिया दारी में ख़ुद को खपाते रहे
खुल के जीना है अब हम को अपने लिए
ज़िंदगी भर हमें सब नचाते रहे
No comments:
Post a Comment