इल्म के चराग़ों बिन रोशनी नहीं होती
दर्द के बिना यारो, शाइरी नहीं होती
ऊँगलियों या होठों का दोष कुछ रहा होगा
बांसुरी कभी यारो बेसुरी नहीं होती
राम जैसा बनने की कोशिशें करो यारो
राम नाम जपने से, बंदगी नहीं होती
दूसरों की ख़ुशियों से जाने क्यों वो कुढ़ते हैं
हमसे तो यूँ ही बेज़ा ख़ुदकुशी नहीं होती
काश चाहने वाला इक हमें मिला होता
ज़िंदगी से फिर ऐसी बेरुखी नहीं होती
लोग यूँ ही भरती के काफ़िये मिलाते हैं
हमसे तो ग़ज़ल से यूँ दिल्लगी नहीं होती
दर्द के बिना यारो, शाइरी नहीं होती
ऊँगलियों या होठों का दोष कुछ रहा होगा
बांसुरी कभी यारो बेसुरी नहीं होती
राम जैसा बनने की कोशिशें करो यारो
राम नाम जपने से, बंदगी नहीं होती
दूसरों की ख़ुशियों से जाने क्यों वो कुढ़ते हैं
हमसे तो यूँ ही बेज़ा ख़ुदकुशी नहीं होती
काश चाहने वाला इक हमें मिला होता
ज़िंदगी से फिर ऐसी बेरुखी नहीं होती
लोग यूँ ही भरती के काफ़िये मिलाते हैं
हमसे तो ग़ज़ल से यूँ दिल्लगी नहीं होती
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