Thursday, July 12, 2012

मसल डाला मुहब्बत के गुलों को क्यूँ अदावत में
चमन में फूल थे महफूज काँटों की हिफाज़त में
नहीं मुमकिन था बच पाना किसी भी हाल में लेकिन
दुआएं आ गयी माँ की सफीने की हिफाज़त में
इन्हे तुम गौर से देखो अजब दस्तूर है इन का
इन्हें तो लुत्फ आता है रिवायत से बगावत में
भला कैसे बना लेते हैं पल में गैर को अपना
मिला है गुर ये हम को तो बुजुर्गों से विरासत में
बनो परिवार का हिस्सा न अपनो से रखो दूरी
बिताओ वक़्त थोड़ा सा तो रिश्तों की कराबत में
कपट लालच घृणा नफरत अहं दिल से नहीं निकले
समय बर्बाद करते हैं दिखावे की इबादत में
मुझे नफरत है ऐसे शक्स से जो हार कर हिम्मत
हमेशा उलझा रहता है मुकद्दर की शिकायत में
फरिश्ते का उसे दर्जा दिया अज्ञात दुनिया ने
खड़ा होता है जो मज़लूम बेकस की हिमायत में

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