न पूछो किस कदर उसने बढाई है परेशानी
छलक उठता है जब तब ही मेरी आँखों का ये पानी
जो दिल के पास है मेरे समायी है जो साँसों में
वो है सब से जुदा यारो नहीं उसका कोई सानी
यूँ कहने को तो कहती है फ़िदा मुझ पर है वो लेकिन
ज़रा सी बात भी उसने कभी मेरी नहीं मानी
हरिक कोशिश मेरी नाकाम ही होती रही हरदम
हुई मुझ पर मुक़द्दर की न पल भर को मेहरबानी
नहीं मंजिल मिली मुझ को रहा हरदम सफ़र में मैं
उधर बढ़ते रहे ये पग जिधर चलने की थी ठानी
बहुत अफ़सोस है अज्ञात कि निष्ठुर ज़माने ने
मेरे ज़ज्बात की कीमत ज़रा भी तो नहीं जानी
छलक उठता है जब तब ही मेरी आँखों का ये पानी
जो दिल के पास है मेरे समायी है जो साँसों में
वो है सब से जुदा यारो नहीं उसका कोई सानी
यूँ कहने को तो कहती है फ़िदा मुझ पर है वो लेकिन
ज़रा सी बात भी उसने कभी मेरी नहीं मानी
हरिक कोशिश मेरी नाकाम ही होती रही हरदम
हुई मुझ पर मुक़द्दर की न पल भर को मेहरबानी
नहीं मंजिल मिली मुझ को रहा हरदम सफ़र में मैं
उधर बढ़ते रहे ये पग जिधर चलने की थी ठानी
बहुत अफ़सोस है अज्ञात कि निष्ठुर ज़माने ने
मेरे ज़ज्बात की कीमत ज़रा भी तो नहीं जानी
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