Sunday, May 31, 2015

पिता के दक्ष हाथों ने मुझे साँचे में ढाला है
मुझे कुलदीप बन घर में सदा करना उजाला है
मेरे नखरे उठाये हैं बड़े नाज़ों से पाला है
बिठाया मुझको कन्धों पर हवाओं में उछाला है
थमा कर अपनी ऊँगली को सिखाया जिसने था चलना...
बनूँगा उसकी मैं लाठी मुझे जिसने संभाला है
कि जिसने खू पसीने से सभी बच्चों को पाला था
उसी की ख्वाइशों पर अब पड़ा मकड़ी का जाला है
सभी के वास्ते त्यौहार पर आये नए कपडे
पिता के शानो पर लेकिन पुराना सा दुशाला है

ajay agyat poetry ghazals: PARYAVARAN...ENVIRONMENT ..GHAZALपर्यावरण दिवस पर...

ajay agyat poetry ghazals: PARYAVARAN...ENVIRONMENT ..GHAZAL
पर्यावरण दिवस पर...
: PARYAVARAN...ENVIRONMENT ..GHAZAL पर्यावरण दिवस पर एक ग़ज़ल ... बद हवासी में दरख्तों को गिराने वालो आबे दरया को यूं ज़हरीला बनाने वालो त...

ajay agyat poetry ghazals: हाथो में कुल्हाड़ी को देखा तो बहुत रोया इक पेड़ जो ...

ajay agyat poetry ghazals: हाथो में कुल्हाड़ी को देखा तो बहुत रोया
इक पेड़ जो ...
: हाथो में कुल्हाड़ी को देखा तो बहुत रोया इक पेड़ जो घबराकर रोया तो बहुत रोया जब पेड़ नहीं होंगे तो नीड कहाँ होंगे इक डाल के पंछी ने सोचा तो ...
हाथो में कुल्हाड़ी को देखा तो बहुत रोया
इक पेड़ जो घबराकर रोया तो बहुत रोया
जब पेड़ नहीं होंगे तो नीड कहाँ होंगे
इक डाल के पंछी ने सोचा तो बहुत रोया
दम घुटता है साँसों का जीयें तो जियें कैसे...
इंसान ने सेहत को खोया तो बहुत रोया
जाने ये मिलाते हैं क्या ज़हर सा मिटटी में
इक खिलता बगीचा जब उजड़ा तो बहुत रोया
हँसता हुआ आया था जो दर्या पहाड़ों से
अज्ञात वो नगरों से गुजरा तो बहुत रोया

paryawaran ghazal

लोग अंधाधुंध कैसे काट ते जाते शजर
पूछते हैं ये परिंदे जाएं तो जाएं किधर
नाज़ है जिस पर तुझे सपनों का ये तेरा महल
जलजला आया तो पलभर में ही जायेगा बिखर
आदमी ने स्वर्ग सी धरती बना डाली नरक...
हो हवा पानी कि मिट्टी सब में घोला है ज़हर
कुछ न ले कर आया था कुछ भी न लेकर जायेगा
मारा मारा फिर रहा है फ़िर भी देखो हर बशर
अपना जीवन उसने दूभर है बना डाला अजय
जिसको दौलत के अलावा कुछ नहीं आता नज़र

Friday, May 15, 2015

ghazal
 
कुछ का कुछ ऐ यार दिखाई देता है
सन्नाटों मे शोर सुनाई देता है
साथ खड़े हैं लोग सभी तो झूठों के
सच के हक़ में कौन गवाही देता है
किस को फुर्सत है उसकी सुध लेने की ...
बूढ़ी मां को कौन दवाई देता है
दोषी के चेहरे पर है मुस्कान सजी
रो रो कर निर्दोष सफाई देता है

ghazal

मेरी हर ख्वाइश अधूरी रह गई
ज़िन्दगी की जुल्फ उलझी रह गई
ज़ेहनो दिल में ठन गई जिस रोज़ से
नींद बस करवट बदलती रह गई
देह के बंधन को त्यागा रूह ने...
ख़ाक बाक़ी बस दो मुट्ठी रह गई
वो बसेरा खाली कर के चल दिए
नाम की तख्ती लटकती रह गई
एक अर्सा हो गया बिछड़े हुए
प्यार की खुश्बू महकती रह गई

Monday, May 11, 2015

PARYAVARAN...ENVIRONMENT ..GHAZAL
पर्यावरण दिवस पर एक ग़ज़ल ...

बद हवासी में दरख्तों को गिराने वालो
आबे दरया को यूं ज़हरीला बनाने वालो

तुम पे कुदरत का यकीनन ही कहर टूटेगा 
वक़्त रहते जो नहीं चेते ज़माने  वालो

सोचिए क्या हश्र होगा उस नई पीढ़ी का
जो कि आएगी तुम्हारे बाद जाने वालो

इस हवस की कोई  हद तो हो मुकर्रर आखिर 
रोज़ आँखों में नए सपने सजाने वालो

कैसे जन्नत को जहन्नुम सा बना डाला है
सोचो खुद को खुद ही सूली पर चढ़ाने वालो