Sunday, December 18, 2011

ghazal

चाहते जो कर गुजरते आज कल के नौजवाँ
देखते हैं ख्वाब ऊँचे आज कल के नौजवाँ
मौज मस्ती के दिनों में भी है माथे पर शिकन
ग़मज़दा रहते हैं कितने आज कल के नौजवाँ
गुल किताबों में न रख कर प्रेयसी को भेजते
नेट पर हैं चैट करते आज कल के नौजवाँ
क्या वज़ह है इस की आखिर गौर फरमाएं ज़रा
मंजिलों से क्यों हैं भटके आज कल के नौजवाँ
अनसुनी कर देते हैं माँ बाप की बातें अजय
अपने निर्णय स्वयं हैं करते आज कल के नौजवाँ

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