चाहते जो कर गुजरते आज कल के नौजवाँ
देखते हैं ख्वाब ऊँचे आज कल के नौजवाँ
मौज मस्ती के दिनों में भी है माथे पर शिकन
ग़मज़दा रहते हैं कितने आज कल के नौजवाँ
गुल किताबों में न रख कर प्रेयसी को भेजते
नेट पर हैं चैट करते आज कल के नौजवाँ
क्या वज़ह है इस की आखिर गौर फरमाएं ज़रा
मंजिलों से क्यों हैं भटके आज कल के नौजवाँ
अनसुनी कर देते हैं माँ बाप की बातें अजय
अपने निर्णय स्वयं हैं करते आज कल के नौजवाँ
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