Sunday, December 18, 2011

ghazal


घर घर चूल्हा चोका करती करती सूट सिलाई माँ
बच्चों खातिर जोड़ रही है देखो पाई पाई माँ

बाबूजी की आमद भी कम ऊपर से ये महंगाई
टूटे चश्मे से बामुश्किल करती है तुरपाई माँ
...
सहते सहते सारे घर की बढती जिम्मेवारी को
घटते घटते आज बची है केवल एक तिहाई माँ

टीका कुंडल हसली कंगन तगड़ी नथ बिछुए चुटकी
बेटी की शादी की खातिर सब गिरवी रख आई माँ

दर्ज़न भर लोगों का कुनबा फिर भी था साँझा चूल्हा
मिल जुल कर रहती थी घर में दादी चाची ताई माँ

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