Sunday, December 18, 2011

ghazal


अन्जान रास्तों पे सफ़र कर रहा हूँ मैं
आगे कदम बढ़ाते हुए डर रहा हूँ मैं

हद पार करने की कभी कोशिश न मैंने की
हर हाल में हदों के ही भीतर रहा हूँ मैं
...
बिखरे हैं ख्वाब टूट के आँखों के सामने
बरबादियों का देखता मंज़र रहा हूँ मैं

दिन भर तुम्हारे बारे में ही सोचता रहा
सपने तुम्हारे देखता शब् भर रहा हूँ मैं

गम के समुन्द्रों में लगा कर के डुबकियाँ
ताजिंदगी तलाशता गौहर रहा हूँ मैं

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