मिलना जुलना जब से है दूभर हुआ
कारोबारे इश्क़ गुड़ गोबर हुआ
कितने साये घेरे रहते हैं मुझे
रौशनी का जब से मैं पैकर हुआ
दुनियादारी में था कुछ कमज़ोर मैं
अपनी तन्हाई का ख़ुद महवर हुआ
कोट-टाई, कुर्ता-धोती, टोपियां
तो कहीं पहचान इक मफ़लर हुआ
कैसी कैसी आ गईं बीमारियां
ऐसे में जीना बहुत दुष्कर हुआ
वक़्त ने बदले हैं तेवर देखिए
क़तरा-ए-शबनम भी है अख़गर हुआ
दिल का मौसम कुछ अजब सा है 'अजय'
खेत अहसासात का बंजर हुआ