Friday, July 9, 2021

कारोबारे इश्क़

 मिलना जुलना जब से है दूभर हुआ

कारोबारे इश्क़ गुड़ गोबर हुआ


कितने साये घेरे रहते हैं मुझे

रौशनी का जब से मैं पैकर हुआ


दुनियादारी में था कुछ कमज़ोर मैं

अपनी तन्हाई का ख़ुद महवर हुआ


कोट-टाई, कुर्ता-धोती, टोपियां

तो कहीं पहचान इक मफ़लर हुआ


कैसी कैसी आ गईं बीमारियां

ऐसे में जीना बहुत दुष्कर हुआ


वक़्त ने बदले हैं तेवर देखिए

क़तरा-ए-शबनम भी है अख़गर हुआ


दिल का मौसम कुछ अजब सा है 'अजय'

खेत अहसासात का बंजर हुआ

किसने कहा

 किसने कहा है तुम से मैं शाइर हूँ बेमिसाल

फ़नकार हूँ कि कोई मुसव्विर हूँ बेमिसाल


अफ़सुर्दगी बिछी है जहाँ दूर दूर तक

उस राहे इश्क़ का मैं मुसाफ़िर हूँ बेमिसाल


परवाज़ ऊंची मेरे तख़य्युल की देख कर

कहने लगे हैं लोग मैं ताइर हूँ बेमिसाल


सौदे में इश्क़ के न मुनाफ़ा हुआ कभी

कैसे भला ये कह दूं मैं ताजिर हूँ बेमिसाल


मुझ को भी तो पता चले आख़िर वो कौन है

किसने कहा है तुम से मैं शाइर हूँ बेमिसाल


मुसव्विर। चित्रकार

अफ़सुर्दगी।  बेचैनी, परेशानी

तख़य्युल  कल्पना

ताइर  पंछी

ताजिर  व्यापारी

कौन समझे

 लफ़्ज़ की बेचारगी को कौन समझे

गुफ़्तगू में ख़ामुशी को कौन समझे


जो भी हो बेइंतिहा प्यारी है मुझको

ज़ीस्त की पेचीदगी को कौन समझे


हर किसी के पास अपना सायबां है

धूप तेरी तिश्नगी को कौन समझे


बस समुंदर ही समझ सकता है इसको

उस से बेहतर इस नदी को कौन समझे


है ज़रूरी हम लुग़त भी साथ रक्खें

इतनी मुश्किल शाइरी को कौन समझे


ख़ुदशनासी की कोई सूरत नहीं है

आइने की बेबसी को कौन समझे


जितने मुँह उतनी ही बातें हो रही हैं

अब हमारी दोस्ती को कौन समझे


जैसे चाहे क़ाफ़िये कहिये ग़ज़ल में

बेसबब हर्फ़े रवी को कौन समझे


पर्यावरण

 गुलशन को रेगज़ार किये जा रहे हैं हम

क़ुदरत पे क्यों ये वार किए जा रहे हैं हम


आबो हवा ये जीने के माफ़िक नहीं बचे

जीवन पे यूँ प्रहार किए जा रहे हैं हम


पर्यावरण का जिस से बिगड़ता है संतुलन

वो काम बार - बार किये जा रहे हैं हम


धरती पे खुल के साँस भी लेना मुहाल है 

ये कैसा कारोबार किये जा रहे हैं हम


'अज्ञात' हम को कब ये भला आएगी समझ

ख़ुद अपना ही शिकार किये जा रहे हैं हम

रब की मेहर से

 ज़र्रे से आफ़ताब हुए रब की मेहर से

जीवन में कामयाब हुए रब की मेहर से


हम दश्ते आरज़ू में थे जिन से घिरे हुए

सब दूर वो अज़ाब हुए रब की मेहर से


बेमंज़री थी पहले जहाँ अब उसी जगह

हमराह हैं गुलाब हुए रब की मेहर से


मेहनत के साथ थोड़ी सी किस्मत भी साथ थी 

हासिल कई ख़िताब हुए रब की मेहर से


मेरी कहाँ बिसात की मैं शेर कह सकूं

अशआर लाजवाब हुए रब की मेहर से

और थोड़ा

 और थोड़ा, और थोड़ा, और थोड़ा

कर लें दुनिया में तमाशा और थोड़ा


कह रही है ज़िंदगी चल साथ मेरे

और थोड़ा और थोड़ा और थोड़ा


खाली है भरने दो मेरा जामे उल्फ़त

और थोड़ा और थोड़ा और थोड़ा


फ़ासले मिट जाएं सारे पास आओ

और थोड़ा और थोड़ा और थोड़ा


कितना भी पाएं, हवस मिटती नहीं है

माँगता है दिल हमेशा 'और थोड़ा'


उसकी मंशा को समझ पाया न कोई

बदहवासी में वो चीख़ा, 'और थोड़ा'


बस अदब की महफ़िलों में आते जाते

सीख लेंगे हम सलीक़ा और थोड़ा


ज़िंदगी का कर्ज़ चुकता कर रहे हैं

रह गया हम पर बकाया और थोड़ा


आज़मा 'अज्ञात' तू ज़ोरे क़लम को

और थोड़ा और थोड़ा और थोड़ा

क्या बात है

 क्या बात है, क्या बात है, क्या बात है

हर बात में अर्थात है, क्या बात है


ये सूरते हालात जो तुम को मिली

अल्लाह की सौगात है, क्या बात है


चश्मे बसीरत है बहुत रौशन तभी

रौशन तुम्हारी ज़ात है, क्या बात है


तख़लीक़ में क्या अहमियत है फ़िक़्र की

सब तुम को मालूमात है, क्या बात है


शेरी अनासिर का तुम्हारा तब्सिरा

क्या बात है, क्या बात है, क्या बात है

ग़ज़ल

 कहाँ हूँ मैं, नहीं मुझ को पता है

जुनूने शाइरी सर पर चढ़ा है


जो मुद्दत से मेरे दिल में बसा है

वो मुझ को मुझ से बेहतर जानता है


वहीं सब अजनबी मुझ को हैं कहते

जहाँ हर कोई मुझ से आशना है


बहुत ही कश्मकश है ज़िंदगी में

मेरा ज़ख़्मे जिगर अब भी हरा है


मुझे मंज़ूर है किरदार मेरा

ये जैसा भी है, अच्छा या बुरा है

ग़ज़ल

 हम उनकी मुहब्बत के तलबगार नहीं हैं

दुनिया में जो भी लोग वफ़ादार नहीं हैं


रखते हैं तवक़्क़ो वे यहाँ सब से मदद की

जो लोग किसी के भी मददगार नहीं हैं


हम ने सभी के वास्ते माँगी हैं दुआएँ

हम तो किसी की राह की दीवार नहीं हैं


चीज़ें हैं सभी काम की जो भी हैं जहां में

बेकार जिन्हें कहते हैं बेकार नहीं हैं


बीमार हैं जो इश्क़ के ज़िंदा हैं वही लोग

मुर्दा हैं वे जो इश्क़ के बीमार नहीं हैं


वो काम जिन्हें करने से घबरा रहे हो तुम

मुश्किल हैं मगर इतने भी दुश्वार नहीं हैं


इस ज़ीस्त को हम अपनी ही शर्तों पे जियेंगे

दुनिया! तेरी शर्तें हमें स्वीकार नहीं हैं


हम रात को दिन, दिन को कभी रात न कहते

हस्सास हैं, झूठे के तरफ़दार नहीं हैं


बुनियाद ही जिसकी हो टिकी झूठ पे 'अज्ञात'

उस रिश्ते के बचने के तो आसार नहीं हैं

ग़ज़ल

 ख़ुद को ज़रा सा वक़्त के साँचे में ढाल कर

रख दे वजूद से ज़रा 'मैं' को निकाल कर


फ़िक्रे सुख़न में खून को रख दे जला के तू

दुनिया तेरी मिसाल दे ऐसा कमाल कर


दे दे निजात प्यास से सहरा को एक दिन

हैरत में डाल दे कोई चश्मा निकाल कर


इस ज़िंदगी से जिस को मुहब्बत नहीं मिली

रखता है अपने सीने में गुस्सा उबाल कर


मेहनत से अपने लक्ष्य को पाने का कर जतन

किस्मत ने क्या दिया है न उसका मलाल कर


इक्कीसवीं सदी के मेरे नोजवान सुन

तहजीब के शजर को तू रखना सँभाल कर


आकाश में न छेद कभी कर सकेगा तू

जितना भी चाहे देख ले पत्थर उछाल कर

ढोलक

 नहीं सुहाती ज़रा भी फटी हुई ढोलक

मैं और कितनी बजाऊँ ये बेसुरी ढोलक


मैं जितना ज़ोर से पीटूँ इसे तो उतनी ही

हँसे है ज़ोर - ज़ोर से ये मसखरी ढोलक


ग़ज़ल सुनाऊँगा तुझ को ये मेरा वादा है

तू तानपूरा बजा या कि फिर कोई ढोलक


वो अपने बाप से मासूमियत से जा लिपटी

फिर उसके पेट को छू कर के कह उठी 'ढोलक'


वो मेमना जो खड़ा है वहाँ रुआँसा सा

ये उस की माँ की ही चमड़ी से है बनी ढोलक


ज़रा क़रीब जो आ कर है तबला बैठ गया

बस इतनी बात पे बिगड़ी है चिड़चिड़ी ढोलक


इसे पसंद है हाथों की चूड़ियों की खनक

ज़रा सा छूते ही उनके मचल उठी ढोलक


कहीं है सुर तो कहीं ताल, माज़रा क्या है

हुआ है क्या जो ये सुर से भटक गयी ढोलक

ग़ज़ल ख़ामख्वा

 बेतरह पत्थर उछाले ख़ामख़्वा

आइने सब तोड़ डाले ख़ामख़्वा


कुछ नहीं इनमें सराबों के सिवा

लोग टकराते पियाले ख़ामख़्वा


एक भी मोती हमें न मिल सका

कितने ही सागर खंगाले ख़ामख़्वा


अपने दिल को अपने क़ाबू में रखो

मत करो मेरे हवाले ख़ामख़्वा


फ़ेसबुक ट्विटर पे रहते वयस्त हैं

हमने कैसे रोग पाले ख़ामख़्वा


तीरगी शब में मुसल्लत है मगर

हो रहे दिन में उजाले ख़ामख़्वा


अपना चेहरा तो नहीं देखा कभी

नुक़्स दर्पण में निकाले ख़ामख़्वा


लौट कर वापिस वहीं पर आ गए

पड़ गए पैरों में छाले ख़ामख़्वा

ग़ज़ल आईना

 आइना दर आइना ये सिलसिला देखा गया

शीशागर ही पत्थरों को पूजता देखा गया


चाह कर भी ख़ुद मैं अपने साथ चल पाया नहीं

ज़ेह्न ओ दिल के बीच अक़्सर फ़ासला देखा गया


इक अजब सा था नज़ारा बज़्म में कल हर कोई

अपने जैसा एक साथी ढूँढ़ता देखा गया


सुर्ख़ियों में है छपा ये आज के अख़बार में

हक़ की ख़ातिर एक गूँगा चीख़ता देखा गया


इश्क़ को रुस्वा न कर दे ये छलक कर इसलिए

आँख की दहलीज़ पर आँसू रुका देखा गया


ऐप पर कर के भरोसा, मंज़िलों की चाह में 

दर ब दर फिर इक भटकता क़ाफ़िला देखा गया


फिर से इसके फूलने फलने की उम्मीदें जगीं

इश्क़ के पौधे पे इक पत्ता हरा देखा गया


बज़्म में जो भी थे सब ने दाद खुल कर दी मुझे

शाइरी में फ़िक़्र का जब ज़ाविया देखा गया

आईना हो जाऊंगा

 तीरगी में रौशनी का सिलसिला हो जाऊँगा

इल्म की भट्टी में तप कर मैं ख़रा हो जाऊँगा


काँच का टुकड़ा हूँ जब तक, चुभ रहा हूँ सब को मैं

सब मुझे देखेंगे, जब मैं आईना हो जाऊँगा


एक टुकड़ा धूप से ईज़ाद कर साये को मैं

अपनी ही परछाईं में जा कर खड़ा हो जाऊँगा


ख़ुदनुमायी, ख़ुदसताइश का नहीं तालिब हूँ मैं

अपने कहने से भला क्या मैं बड़ा हो जाऊँगा


हो चला है अब पुराना रूह का ये पैरहन

एक दिन इसको बदल कर मैं नया हो जाऊँगा