Wednesday, December 28, 2011

ghazal

कल  शाम  जिंदगी  से  मुलाकात  हो  गयी
क्या  असलियत  है  उस  की  मुझे  ज्ञात  हो  गयी
उस  से  जरा  सा  वक़्त  ही  माँगा  था  भीख   में
वो  लाल  पीली  मुझ  से  बिना  बात  हो  गयी
अपना  समझ  के  डांट पिलाई  थी  उसने  जो
मेरे  लिए  वो  डांट  भी  सौगात  हो  गयी
मेरी  ख़ुशी  को  देख  कर  तकदीर  जल  गयी
अज्ञात  जिस  का  दर  था  वही  बात  हो  गयी
फिर  रूह  लौट  आयी  है  इक  लाश  में  यहाँ
अज्ञात  ये  तो  सच  में  करामात  हो  गयी

Sunday, December 18, 2011

ghazal


घर घर चूल्हा चोका करती करती सूट सिलाई माँ
बच्चों खातिर जोड़ रही है देखो पाई पाई माँ

बाबूजी की आमद भी कम ऊपर से ये महंगाई
टूटे चश्मे से बामुश्किल करती है तुरपाई माँ
...
सहते सहते सारे घर की बढती जिम्मेवारी को
घटते घटते आज बची है केवल एक तिहाई माँ

टीका कुंडल हसली कंगन तगड़ी नथ बिछुए चुटकी
बेटी की शादी की खातिर सब गिरवी रख आई माँ

दर्ज़न भर लोगों का कुनबा फिर भी था साँझा चूल्हा
मिल जुल कर रहती थी घर में दादी चाची ताई माँ

ghazal


कूच ए इश्क से ये बार बार गुजरी है
ज़िन्दगी अपनी सदा खुशगवार गुजरी है

वो लगाते हैं जो चक्कर तुम्हारी गलियों के
इक यही बात हमें नागवार गुजरी है
...
क्या बताएं कि गुजरी है ज़िन्दगी कैसे
बिन तुम्हारे ये बहुत बेकरार गुजरी है

ghazal


जीने का हर सामान है कोई कमी नहीं
जाने क्यूँ फिर भी ज़िन्दगी में इक ख़ुशी नहीं
इस ज़िन्दगी के वास्ते क्या क्या नहीं किया
बढती हवस इसकी मगर घटती कभी नहीं
इस ज़िन्दगी के मायने आये नहीं समझ
... जब तक मेरे जेहन में हुई रौशनी नहीं
हर शेर में ढाला है इक इक तज्रिबात को
है ज़िन्दगी का फलसफा ये शायरी नहीं
सच बात तुझ से कहता हूँ मत मानना बुरा
ए ज़िन्दगी तू तो किसी भी काम की नहीं

ghazal


अन्जान रास्तों पे सफ़र कर रहा हूँ मैं
आगे कदम बढ़ाते हुए डर रहा हूँ मैं

हद पार करने की कभी कोशिश न मैंने की
हर हाल में हदों के ही भीतर रहा हूँ मैं
...
बिखरे हैं ख्वाब टूट के आँखों के सामने
बरबादियों का देखता मंज़र रहा हूँ मैं

दिन भर तुम्हारे बारे में ही सोचता रहा
सपने तुम्हारे देखता शब् भर रहा हूँ मैं

गम के समुन्द्रों में लगा कर के डुबकियाँ
ताजिंदगी तलाशता गौहर रहा हूँ मैं

ghazal

बेहद कमाल का है हुस्नो जमाल तेरा
रहता है मेरे दिल में हर पल ख्याल तेरा
आँखों ही आँखों में तू करती है मुझ से बातें
अंदाज़ गुफ्तगू का है बेमिसाल तेरा
नागिन सी काली पुरखम जुल्फें ये माशा अल्लाह
बलखा के ये कमर को चलना कमाल तेरा

ghazal


टूटे दिल के ज़ख्म छिपाएं हम कब तक
अधरों पर मुस्कान सजाएँ हम कब तक

खुदगर्जों की दुनया में सच्चे झूटे
संबंधों को और निभाएं हम कब तक
...
ऊब गए हैं रोज़ यही करते करते
जीवन का एहसान उठायें हम कब तक

ghazal


देखने में तो भले छोटा है वो
पर इरादे का बड़ा पक्का है वो
जात से अपनी बहुत पुख्ता है वो
आम जन का पेशवा अन्ना है वो
कौन कहता है की गाँधी मर गया
बन के अन्ना आज भी जिंदा है वो
कुछ अलग ही बात है उस शख्स में
आम इंसां है मगर यकता है वो
रौशनी करना ही उसका ध्येय है
दीप बन कर राह में जलता है वो

ghazal

चाहते जो कर गुजरते आज कल के नौजवाँ
देखते हैं ख्वाब ऊँचे आज कल के नौजवाँ
मौज मस्ती के दिनों में भी है माथे पर शिकन
ग़मज़दा रहते हैं कितने आज कल के नौजवाँ
गुल किताबों में न रख कर प्रेयसी को भेजते
नेट पर हैं चैट करते आज कल के नौजवाँ
क्या वज़ह है इस की आखिर गौर फरमाएं ज़रा
मंजिलों से क्यों हैं भटके आज कल के नौजवाँ
अनसुनी कर देते हैं माँ बाप की बातें अजय
अपने निर्णय स्वयं हैं करते आज कल के नौजवाँ

Sunday, November 13, 2011

sher

वो था मुहीत मेरे ख्यालों पे इस कदर
उसको तमाम रात ही मैं सोचता रहा

ghazal

भावना को शब्द का आकार दे
लेखनी को चेतना की धार दे
श्रेय पथ पर अग्रसर होता रहूँ
आचरण को सत्य का आधार दे
मानसिक शुचिता अनूठी धीरता
आत्म संयम का मुझे उपहार दे
शायरों में नाम मेरा हो शुमार
कुछ अनूठे तू मुझे अशआर दे
हम नहीं छोड़ेंगे राहे रास्त को
तू डगर आसान या दुश्वार दे
है मुझे मंजूर तेरा फैसला
गुल अता कर या मुझे तू खार दे

ghazal

जीने का हर सामान है कोई कमी नहीं
जाने क्यूँ फिर भी ज़िन्दगी में इक ख़ुशी नहीं
इस ज़िन्दगी के वास्ते क्या क्या नहीं किया
बढती हवस इसकी मगर घटती कभी नहीं
इस ज़िन्दगी के मायने आये नहीं समझ
जब तक मेरे जेहन में हुई रौशनी नहीं
हर शेर में ढाला है इक इक तज्रिबात को
है ज़िन्दगी का फलसफा ये शायरी नहीं
सच बात तुझ से कहता हूँ मत मानना बुरा
ए ज़िन्दगी तू तो किसी भी काम की नहीं

ghazal

जिंदगी जीने का तब तक कायदा आया न था
खाईओं को दिल की जब तक पाटना आया न था
दुसरे के ऐब हम को तब तलक दिखते रहे
सामने जब तक हमारे आइना आया न था
कुर्बतों की अहमियत को हम नहीं पाए समझ
दरमियाँ जब तक हमारे फासला आया न था
जिस दिए की लो बचाई हाथ उस से जल गया
ठीक से हम ही को शायद ढापना आया न था
देर तक अज्ञात खुशियों से रहे महरूम हम
जिंदगी में ठीक से गम पालना आया न था

ghazal


jine ka har samaan hai  koi kami nahi.n
jane kyun phir bhi zindagi mei.n ik khushi nahi.n

is zindagi ke waste kya kya nahi.n kiya
badhti hawas iski magar ghat ti kabhi nahi.n

is zindagi ke mayne aye nahi.n samajh
jab tak mere jehan mei.n hui roshni nahi.n

har sher mei.n dhaala hai ik ik tazribat ko
hai zindagi ka falsafa ye shayari nahi.n

sach baat tujh se kahta hu.n mat maan na bura
e zindagi tu to kisi bhi kaam ki nahi.n

ghazal


ankho.n se aansoo chalkaye.n hum kab tak
tasveero.n se dil bahlaye.n hum kab tak

toote dil ke zakhm chipaye.n hum kab tak
adhro.n par muskaan sajaye.n hum kab tak

khudgarzo.n ki dunya mei.n sacche jhoote
sambandho.n ka bojh uthaye.n hum kab tak

oob gaye hai.n roz yahi karte karte
jeevan ka ehsaan uthaye.n hum kab tak

jug walo.n ko khush rakhne ki khatir hi
sacchi jhooti baat banaye.n hum kab tak

ghazal

दिल लगाने के नतीजे सब मुझे मालूम हैं
खूबसूरत बेवफाओं के पते मालूम हैं
आदतों से आपकी वाकिफ हूँ मैं अच्छी तरह
मुझ को सारे कारनामे आप के मालूम हैं
बस ज़रा सी कोशिशों की ही ज़रुरत है फकत
कामयाबी के मुझे सब रास्ते मालूम हैं
हँसते हँसते गम उठाता हूँ गिला करता नहीं
जिंदगी जीने के मुझ को कायदे मालूम हैं
और कुछ मालूम चाहे हो न हो अज्ञात को
जिंदगानी की ग़ज़ल के काफिये मालूम हैं

Thursday, March 31, 2011

ghazal on mother

घर घर चूल्हा चौका करती  करती सूट सिलाई  माँ
बच्चों खातिर जोड़ रही है देखो पाई पाई मां

बाबूजी की आमद भी कम ऊपर से ये महंगाई
टूटे चश्मे से बामुश्किल करती है तुरपाई मां

टीका कुंडल हसली कंगन  तगड़ी नाथ बिछुए चुटकी
बेटी की शादी की  खातिर सब  गिरवी रख आई मां

सहते सहते सारे घर की बढती जिम्मेवारी को
घटते घटते आज बची है केवल एक तिहाई मां

सारे रिश्ते झूठे निकले मतलब के थे यार सभी
केवल तूने ही आजीवन निश्छल प्रीत निभाई मां

पिज्जा बर्गर कब होते थे होते थे मीठे पूड़े
देती थी रोटी पर रख कर शक्कर और मलाई मां

घेरा जब जब अवसादों ने अंधियारों में जीवन को
उम्मीदों के दीप जला कर भोर सुहानी ली मां

दर्ज़न भर लोगों का कुनबा फिर भी था सांझा चूल्हा 
मिलजुल कर रहती थी घर में दादी चाची ताई मां

नाम सभी हैं गुड से मीठे चाहे मैं कुछ भी बोलूं 
बी जी जननी माता मम्मी  मैया अम्मा माई मां

बच्चा ही मकसद होता है मां के जीवन का अज्ञात
हिम्मत दे उस के ख्वाबों को देती है ऊंचाई मां




      

   

ghazal

कहाँ कोई हिन्दू मुसल्मा बुरा है
जो नफ़रत सिखाये वो इंसा बुरा है

सियासत में हरगिज़ न इनको घसीटो
न गीता बुरी है न कुर आ   बुरा है

लहू जो बहाता है निर्दोष जन का
यक़ीनन अधर्मी वो शैता बुरा है

उजाड़े नशेमन परिंदों का नाहक
उखाड़े शज़र जो वो तूफा बुरा है

बिना कुछ किये ही मिले कामयाबी
ये हसरत बुरी है ये अरमा बुरा है

सफ़र जिंदगानी का छोटा है बेशक
जुटाना बहुत सारा सामा बुरा है